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صداي جارو - صبحانه در تنهايي چه سرد چه سرد |
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درختان جنگل چندي پيدا ، چندي ناپيدا - مهتاب پاييزي
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با احترام به راوي گوشه و ولايات انارهاي دريده بي خوابي درون منزلگاه ييلاقي - پارس سگان دور |
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دودكش ِ بلند برفرازش لانه ي لك لكي - برگ ريزان |
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قايم باشك – در تنور پنهان مي شوم كنار يك مارمولك |
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كرسي داغ – ماه در قاب پنجره پيدا ست |
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كلاهش بوي كلاغ مي دهد مترسك ِ عريان |
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جناب آقای درویشی در اینجا درمورد پادشاهي . . . كفش بلورين توضيحاتي را ارائه فرموده اند.
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صبح ِ سرد - جمع ِ پُـنكه هاي ترشي گوشه ي حياط |
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چند روزيست حرف تازه اي ندارم . حق با عزازيل بود
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عصر تابستان - يكي يكي مي رسند گاوها از چرا |
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پياده روي – افتادن برگ چنار كف ِ دست ِ سرد |
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غروب پاييزي – سنگ قبرهاي كهنه رو به آبادي
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شامگاه كوهستاني – چراغ هاي شهر دور روشن مي شوند |
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دستان ِ سپيدارهاي سپيد را نغمه ي پرندگان به حركت در مي آرد . سروي آن گوشه صورتش را به صورت ماه مي مالد ، و سكوت تن خويش را به زمزمه ي رود شستشو مي دهد . باد آرام وزيد. اين سو من دل نگران و شب خاموش ؛ وآن سو تو خاموش و من دل نگران . . . |
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يكي يكي دو تا ، دوتا مي لرزند بامبوهاي خاموش |
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شالاپ ، شالاپ - بر سنگ هاي خزه پوش چندي غوك باران |
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سگ پارس مي كند به بادهاي پاييزي فانوسي لرزان |
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تابلوي نئون - جعبه ي مداد رنگي درون ِ ويــــترين |
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باران آرام – در پياده روي خيس صندوق پست |
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